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Geeta ke Shlok in Hindi

हमारे पूर्वजों ने हमें कुछ ऐसी चीज़ें हमारे लिए छोड़ी हैं, जिस से हमारा जीवन आसान हो जाए।  उनमें कुछ ‘धर्म गरंथ’ मुख्या हैं, हम उन्हीं धर्म ग्रंथों में से एक की बात करेंगे Geeta। हाँ जी Geeta ke Shlok in Hindi।

Geeta ke Shlok in Hindi में गीता के कुछ ऐसे श्लोक जिन से हमारा जीवन बदल सकता है।

वैसे तो हर एक तक गीता पढ़ लेनी चाहिए यकीन मानिये जीवन का निचोड़ है गीता में। गीता के श्लोक पढ़ने से अज्ञानता, depression , नेगेटिविटी आदि का अंत होता है।

तो चलिए शुरू करते हैं bhagavad gita ke shlok …….


Table of Contents

हतो वा प्राप्यसि स्वर्गम्, जित्वा वा भोक्ष्यसे महिम्।
तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय:॥

युद्ध में अगर तुम मर गए तो स्वर्ग प्राप्त करोगे ,अगर तुम जीते तो पृथ्वी को भोगोगे।  मतलब जीत के बाद सारा राज्य तुम्हारा ही होगा। अन्तः हे कौन्तेय ! युद्ध का निश्चय कर तुम खड़े हो जाओ।

आज कल के दौर में हम बस डर कर जिए जा रहे हैं । किसे time है आवाज़ उठाने का ?

शायद हम भूल ही गए हैं की वो कुरुक्षेत्र जंग के लिए नहीं ज्ञान के लिए था।  वरना तो सोचिये जिसके इसारे पे ये दुनिया चलती है, कितना ही मुश्किल होता उसे 1 सेना को हराना।

क्षण भर का काम था पर ज्ञान देना था

तो कुछ बुरा लगे तो please आवाज़ उठायें जो जीत गए तो हमेशा के लिए जी जाओगे और हार  गए तो हमेशा के लिए पहचान बना पाओगे।


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत:।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे॥

ये actually दो श्लोक थे Geeta ke Shlok in Hindi में पर मुझे लगा साथ में इनका महत्व बढ़ जाता है।

जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब भगवान अधर्म का नाश करने के लिए अवतार लेते हैं।

अच्छे लोगों के कल्याण के लिए , दुष्कर्मियों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए भगवान हर एक युग में जन्म लेते हैं।

इसमें हमें क्या मिला ? भगवान आ रहे हैं जा रहे हैं में क्या करूं ?

इसका जवाब देने से पहले आप खुद को इसका जवाब दीजिये की क्यों प्रभु श्री राम ने बाली का साथ नहीं दिया जबकि वो तो राजा थे महाशक्ति शाली थे।

कारण एक लाइन थी अच्छे और बुरे की।

तो आप हमेशा अपने कर्म ऐसे रखिये की आप Mirror (आईने ) में खुद को देख पाएं और बोल पाएं की आप सही जा रहे हो।

Bhagavad gita ke shlok


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थ :-  तुम बस कर्म ही कर सकते हो, क्योंकि बस कर्म करना ही तुम्हारे हाथ में है।  कर्म का फल क्या होगा ये तुम्हारे हाथ में नहीं है। इसलिए तुम बस कर्म करते रहो तुम्हें उचित फल, उचित समय आने पे मिलेगा।

गौर करने वाली बात ये है की यहां कर्म कैसे हों पर नहीं बस कर्म पर ध्यान दिया गया है।  अच्छे कर्म तो अच्छे फल बुरे कर्म तो फिर बुरा फल। पर फल मिलेगा जरूर कब मिलेगा कितना मिलेगा ये मनुस्या के हाथ में नहीं है।


ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

अर्थ – लगातार विषयों (objects) के बारे में सोचते रहने से मनुष्य के मन में उनके प्रति लगाव (Attachment) पैदा हो जाता है।  ये लगाव ही मनुष्य में इच्छा को जन्म देता है और यह  इच्छा क्रोध को जन्म देती है।

साधारण शब्दों में समझिये आप को पहले साइकिल चाहिए थी फिर मोटर साइकिल फिर कार और अब कार में भी ब्रांड ऊपर के चाहिए।

अब जब आप दिन भर ये ही सोचते रहोगे।  तो उस कार के लिये आप का “लगाव ” बढ़ता रहेगा आप हमेशा ही उसके बारे में सोचोगे और ऐसे में अगर वो आप को नहीं मिल पाता तो क्या होता है ?

गुस्सा आएगा हेना ?

और Option ही क्या है ?

तो ऐसी सिचुएशन से उभरने के लिए क्या करें क्या हम कोई सपना देख के उसे पूरा करने की ना सोचें ?

नहीं बिल्कुल नहीं आप सपनों की जगह हकीकत में जिया कीजिये।  आप कर्मा पे भरोसा कीजिये क्योंकि कर्मा आप को रिजल्ट देगा और सिर्फ सपना आप को नाकामी और नाकामी आप को गुस्सा देगा।

यकीन मानिये गुस्सा किसी के लिए भी ठीक नहीं है।


क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

अर्थ :- क्रोध से मनुष्य की बुद्धि मारी जाती है यानी अक्ल चलना बंद हो जाती है। जब आप की अक्ल ही नहीं चलेगी तो होगा आप के जीवन का नाश निश्चित है।

जैसा हमने ऊपर ही बताया की गुस्से में आप बस अपना नुकसान ही करते हो नुकसान चाहे रिश्तों का हो , पूंजी का हो या किसी अन्य रूप में हो।

अन्तः अगर आप संतुस्ट हैं तो आप इस कर्मचक्र से बाहर हैं।

तो इच्छा कीजिये पर उतनी जितनी आप पूरी कर सकें।


यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

श्रेष्ठ मनुष्य जो-जो करता है, दूसरे लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो कुछ सिखाता है,  दूसरे मनुष्य उसी के अनुसार सिख के व्यवहार करते हैं।

ये बात सटीक बैठती है हमारे leaders के लिए politician के लिए  और आप के लिए।

आप अगर अच्छा आचरण करेंगे तो आप के छोटे भी आप से सिख के वैसा ही करेंगे।  तो हमेशा ध्यान रखिये लोग आप को example की तरह रख के देख रहे हैं तो गलत example ना बनें।


श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

अर्थ :- श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति और जिस व्यक्ति ने अपनी इन्द्रियों पे विजय प्राप्त कर ली है वह निश्चित ही ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके वह जल्द ही  परम शान्ति को प्राप्त होता है।

हमें भटकाने का काम कौन करता है ?

हमारी इन्द्रियां, इन्द्रियां ही मनुष्या को लालच देती है चाहे जीभ हो जो स्वाद के प्रति हमेशा लालच में रहती है।  चाहे नाक हो जो हमेशा गंध (smell ) के प्रति  हमेशा लालच में रहती है।

अंतः जो व्यक्ति अपनी सभी इन्द्रियों पे control कर लेता है वो हर चुनौती जीत जाता है।

Bhagavad gita ke shlok में हमेशा ही इन्द्रियों को control (नियंत्रित ) करने की बात कहि गयी है।


यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥

जिसके लिए ना कोई पल अत्यंत ख़ुशी दायी है और ना ही कोई पल अत्यंत दुःख दायी है।  जिसके लिए शुभ अशुभ सब एक बराबर है। वह पुरुष परमेश्वर को अत्यंत प्रिया है।

जैसा ऊपर भी बताया था की जो इन्द्रियों को control कर लेता है वह सब जीत जाता है।

क्योंकि हर situation में एक समान तो वो ही रह सकता है जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया हो।

अब आज कल के बाबा को देख लीजिये कहते हैं हम फ़क़ीर हैं और अंत में उनके पास इतने आश्रम इतनी सम्पति होती है की हम और आप जैसे लोग ठगे के ठगे रह जाते हैं ।


यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य: ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय:॥

अर्थ :- जो कभी किसी को कष्ट नहीं पहुँचता तथा जो किसी के द्वारा भी विचलित नहीं होता, जो सुख और दुख में, डर तथा चिन्ता में एक ही जैसा रहता है, वह भगवान को अत्यन्त प्रिय है।

आप ऐसा कब कर सकते हो जब आप इधर उधर ध्यान ना दे कर के पुरे focus होकर अपने कर्म करते हो।


सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच:॥

अर्थ :- सभी प्रकार के धर्मो को छोड़कर बस मेरी शरण में आ जाओ।  में तुम्हे सभी प्रकार के पापों से मुक्त कर दूंगा और इसमें कोई भी संदेह नहीं हैं।

जब हमारे धर्म ग्रंथ ही ऐसी बातें बोल कर गए हैं तो भी हम जाती , धर्म आदि के चक्र में फंसे रहते हैं।

याद रखिये श्रद्धा का कोई धर्म नहीं होता और धर्म कभी भी श्रद्धा से बड़ा नहीं हो सकता।

प्रभु चाहते हैं हम आडंबर ना करें पर हम अंध्विश्वास के चक्र्व्यू में फंस रखे हैं।

अन्तः सब भूल के बस प्रभु की शरण में चलिए और पढ़ते रहिये bhagavad gita ke shlok ।


नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।।

तुम अपने नियत कर्म करो क्योंकि अकर्म से श्रेष्ठ है कर्म । तुम्हारे अकर्मी होने से (तुम्हारा) शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।

तो चाहे जो भी हो हमेशा कर्म करो और कर्मों को ही महत्व दो।

अच्छा आज कल होता है क्या है ? की quick success के चक्र में लोग काम तो शुरू कर देते हैं पर कुछ दूर चल कर खो जाते हैं।

आप हमारा आर्टिकल काम को पूरा कैसे पढ़ें भी पढ़ सकते हैं।

बाकी अपना ध्यान रखें और अपने बहुमूल्य comments नीचे छोड़िये।

Geeta ke Shlok in Hindi में आज के लिए इतना ही ।