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Kabir Das Ke Dohe | Kabir Ke Dohe Kalyug Ke Liye

Kabir Das Ke Dohe
Kabir Das Ke Dohe

एक व्यक्ति को हर दिन एक श्लोक पढ़ लेना चाहिए। तो आज हम लाये हैं Kabir Das Ke Dohe या Kabir Ke Dohe Kalyug Ke Liye जिन्हें पढ़ के आप प्रेम में पड़ जायेंगे और प्रेम का महत्व समझेंगे।

दुनिया में मोटिवेशन की शुरुआत और सच्चे मोटिवेशनल गुरु तो हमारे पूर्वज थे। ऐसी ऐसी बातें लिख के और बोल के गए हैं, की लगेगा जैसे उनको फ्यूचर पता था।

उनमें से एक गुरु हैं संत कबीर दास जी।

इनकी हर लाइन इतनी अच्छी और इतनी मीनिंग फुल होती हैं की अगर हम इनमें से कुछ को ही फॉलो करें तो हमारा जीवन सफल हो जाए।

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तो चलिए बात करते हैं Kabir Das Ke Dohe की। वैसे ये दोहे नहीं है हैं ज्ञान का भंडार है अमृत की वर्षा है तो चलिए मिल के भीगते हैं।

Table of Contents

Kabir Das Ke Dohe

कबीर प्रेम न चक्खिया,चक्खि न लिया साव
सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव

कबीर कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने प्रेम को चखा नहीं, और चख कर स्वाद नहीं लिया, वह उस अतिथि के समान है जो एक सूने, निर्जन घर में जैसा आता है, वैसा ही चला भी जाता है। बिना कुछ प्राप्त किये।

इस पे मुझे एक लाइन याद आती है

ऊधौ , तुम हो अति बड़भागी ।
अपरस रहत सनेह तगा तैं , नाहिन मन अनुरागी।

kabir dohe on life in hindi

हम सांसारिक व्यक्ति हैं, इस संसार में खाली हाथ आये थे और खाली ही चले जाएंगे पर प्रेम एक ऐसी चीज़ है जो आप को यहीं स्वर्ग का अनुभव करा देती है।

प्रेम जो निस्वार्थ हो , प्रेम जिसमें सिर्फ देना हो , प्रेम जिसमें दूसरे की खुशियों का इतना ही ध्यान रखें जितना अपनी।

प्रेम ही क्षमा है, प्रेम ही त्याग है प्रेम ही सन्यास है
प्रेम ही नियम है, प्रेम ही पुस्तक प्रेम ही उपन्यास है
प्रेम ही कृष्णा है, कृष्णा ही सत्या है

बस आप के आस पास जो कोई भी दिखे उसे प्यार करें, उसकी इज्जत करें, माफ़ करें गलतियों को

यकीन मानिये हो सकता है शुरू में आप को तकलीफ हो पर एक समय बाद आप खुद से इतने खुश होंगे की आप को आंतरिक शांति और सुख महशुश होगा।

कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई

प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पडा जिससे मेरी अंतरात्मा तक भीग गई, आस पास पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया, खुश हाल हो गया, आनंदमय हो गया। यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है।

हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीते ?

वो ही बात जो हमने ऊपर कहि थी। लोग एक दूसरे से प्यार करते हैं मगर स्वार्थ के लिए और अगर स्वार्थ के लिए प्यार किया जाये तो वो कभी भी आगे नहीं बढ़ पाता।

कुछ लोग जीवन में दो दिन के लिए आते हैं अपना काम निकलवाते हैं और चले जाते हैं यकीन मानिये ये प्रेम नहीं है।

प्रेम साथ देना है, प्रेम हिम्मत देना है और प्रेम खुशहाल जीवन की एक सीढ़ी है।

फिर ना जाने क्यों हम सीने में द्वेष, ईर्ष्या जलन ले के घुमते फिरते हैं।

अगर किसी से कोई गलती हो जाये तो उसे बताएं की यहाँ आप गलत थे मन में चीज़ें रखने से बस आप नकारात्मकता की और जाते हैं।

तो कोशिश कीजिये प्यार बाँटते चलें।

और अगर कोई आप को निस्वार्थ भाव से प्यार करता है तो उसका ख्याल रखें।

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर

व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में माला ले के बस घुमाता ही रहता है , पर मन इतना चंचल होता है की उसमें उथल पुथल बनी रहती है।

ये हलचल कभी शांत नहीं होती। कबीर जी ऐसे व्यक्ति को सलाह देते हैं कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को फेरो।

आज कल लोगों के मन में बहुत उथल पुथल चल रही होती है। ऐसे में लोग मन लगाने के लिए क्या कुछ नहीं करते , पर जो जरूरी है वो बस उसे ही नहीं करते।

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय
बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय

जो हमेशा आप की निंदा करते हैं, उसे हमेशा अपने पास ही रखना चाहिए। वह बिना साबुन और पानी के ही हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करते हैं।

आज कल कोई आप की एक झुट्ठी तारीफ कर दे बस आप उस के मुरीद हो जाते हैं ।

पर कहीं अगर कोई एक बुराई कर दे तो हम उस से इतनी दुरी बना लेते हैं की क्या बताऊं। इसका नतीजा ये होता है की हम सुधार की गुंजाइस खो बैठते हैं।

अगर दशानन रावण विभीषण की सुन लेते तो सोचिये इतना महान और समझदार व्यक्ति आज एक अलग छवि में हमारे सामने होता।

कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन
कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन

कहते सुनते सब दिन निकल गए पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया। कबीर कहते हैं कि अब भी यह मन होश में नहीं आता। आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है।

लोगों की समस्या ये है की वो हर बात पे चर्चा कर के भूल जाते हैं, पर जिसकी हमें सबसे ज्यादा जरूरत है वो है उस चर्चा से समझ कर अपने जीवन को बदलना।
जरूरी है मन की भावना समझना उसे एकाग्र करना।

पानी केरा बुदबुदा, अस मानुस की जात
एक दिना छिप जाएगा,ज्यों तारा परभात

जैसे पानी के बुलबुले का जीवन छण दो छण का होता है। जैसे सुबह होते ही तारे छिप जाते हैं, वैसे ही ये मनुष्य का शरीर भी एक दिन नष्ट हो जाएगा।

कितनी गहरी बात है, अगर आप सोचें तो लोग लोभ मोह माया में इतने अंधे हो जाते हैं की बस भूल ही जाते हैं।

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ

व्यक्ति का शरीर एक पंछी बन चुका है और उसी तरफ उड़ जाता है जिस तरफ उसका मन उसे ले जाता है। शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है।

सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही बन जाता है।

झूठे को झूठा मिले, दूंणा बंधे सनेह
झूठे को साँचा मिले तब ही टूटे नेह

जब झूठे आदमी को दूसरा झूठा आदमी मिलता है तो उनका प्रेम बढ़ता है। पर जब झूठे को एक सच्चा आदमी मिलता है तभी प्रेम टूट जाता है।

आपने सूना होगा बचपन में

राम मिलाये जोड़ी एक अंधा एक कोड़ी

तो कहने का कुल मतलब ये है की जैसी आप की परवर्ती होती है वैसे ही आप के दोस्त भी होते हैं।

और यकीन मानिये आप कैसे लोगों के बीच रहते हैं ये आप के भविष्या में एक अहम रोल निभाता है।

kabir dohe on life in hindi

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय

कबीर कहते हैं कि ऐसा धन इकट्ठा करो जो भविष्या में काम आये क्योंकि सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते हुए तो आज तो कोई नहीं दिखा।

यहां कबीर कहना चाहते हैं आप अपने ज्ञान पे काम कीजिये।

आप धन संचय करने की जगह पर बस ज्ञान एकत्र कीजिये अच्छे कर्म कीजिये और यकीन मानिये ये आप के साथ रहेंगे जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी।

मनहिं मनोरथ छांडी दे, तेरा किया न होइ
पाणी मैं घीव नीकसै, तो रूखा खाई न कोइ

अगर आप इस लाइन को समझोगे तो समझ आएगा की कितनी गहरी बात कहि गयी है इसमें।

कबीर कहते हैं मन की इच्छाओं को छोड़ दो। उन्हें तुम अपने बल पर पूरा नहीं कर सकते। जैसे की यदि जल से घी निकल जाए, तो कोई भी रूखी रोटी नहीं खायेगा।

मतलब हम कोशिश करना छोड़ दें ?

नहीं आप अपने जी जान से प्रयत्न कीजिये। पर हर बार आप के मन का रिजल्ट आये ये जरूरी नहीं तो उस रिजल्ट को देख के घबराएं नहीं बल्कि लगे रहें प्रयत्नशील रहें।

अंग्रेजी में एक लाइन है

लाइफ इस 10% हाउ यू मेक इट एंड 90% हाउ यू टेक इट

यानि जीवन वैसा नहीं बनता जैसा आप चाहते हो जीवन वैसा बनता है जैसे आप उसे लेते है। अगर फेलियर से डर कर रिस्क नहीं लिया तो आप कभी सक्सेस की भूक नहीं मिटा पाओगे।

और पानी से घी थोड़े निकलता है घी तो उन्ही को मिलता यही जो मेहनत करते है। निरंतर प्रयत्नशील रकते हैं।

ऊंचे कुल क्या जनमिया जे करनी ऊंच न होय
सुबरन कलस सुरा भरा साधू निन्दै सोय

यदि कार्य उच्च कोटि के नहीं हैं तो उच्च कुल में जन्म लेने से क्या लाभ? सोने का कलश यदि सुरा से भरा है तो साधु उसकी निंदा ही करेंगे।

लोग कहीं ना कहीं जाती के आधार पर ऊंच नीच तय करते हैं। पर क्या इसे बदलने की जरूरत नहीं है ?

क्या जरूरी नहीं हो गया है की व्यक्ति की पहचान उसके कर्म से हो ना की उस से जो वो जन्म से पहले से ले के आया है।

इसी पर महाभारत में भी कर्ण ने कहा है

जाति-जाति रटते, जिनकी पूँजी केवल पाषंड,
मैं क्या जानूँ जाति ? जाति हैं ये मेरे भुजदंड

बाकि और पढ़ने के लिए आप खरीद सकते हैं

Rashmirathi

मन के हारे हार है मन के जीते जीत
कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत

जीवन में जीत और हार बस मन की भावनाएं ही हैं।

अगर मनुष्य ने हार मान नई और मन में सोच लियए की मैं हार गया तो यकीन मानिये 90 लड़ाई वो हार चुका है। ईश्वर को भी मन के विश्वास से ही पाया जा सकता है। यदि प्राप्ति का भरोसा ही नहीं तो कैसे पाएंगे?

हार होती है जब मान ली जाती है …..
की हार होती है जब मान ली जाती है .
और जीत तो तब होती है जब ठान ली जाती है।

तो अपने आप पर यकीन रखें आप बेहतरीन कर सकते हैं बस जरूरत है तो खुद के खुद पे भरोसे की।

जिहि घट प्रेम न प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम
ते नर या संसार में , उपजी भए बेकाम

जिनके ह्रदय में न तो प्रीति है और न प्रेम का स्वाद, जिनकी जिह्वा पर राम का नाम नहीं रहता।  वे मनुष्य इस संसार में उत्पन्न हो कर भी व्यर्थ हैं।

प्रेम जीवन की सार्थकता है।  प्रेम रस में डूबे रहना जीवन का सार है।

अगर आप किसी को प्यार दे नहीं सकते तो आप का जीवन व्यर्थ है। यकीन मानिये जीवन का असली सुख ही प्रेम है।

तो बस डूब जाइये प्रेम रुपी सागर में और त्यार हो जाइये परमेश्वर के दर्शनों के लिए।

उम्मीद करता हूँ Kabir Das Ke ये Dohe आप की ज़िंदगी में काम आएंगे। साथ ही Kabir Ke Dohe Kalyug Ke Liye पढ़ना ना भूलें। आप कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं की kabir dohe on life in hindi आप को कैसा लगा।