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Kabir ke dohe kalyug ke liye

kabir ke dohe
kabir ke dohe kaliyug ke liye

आज दोहे पढ़तेपढ़ते लगा जैसे कबीर जी ने पता नहीं कैसे इतने दूर का देख लिया होगा , जाने क्या भांप लिया होगा जो ये दोहे लिखे। मेरा आप से अनुरोध है कृप्या इसे ज्यादा से ज्यादा लोगो को भेजें खासकर  उन नोजवानो को जो social media में कहीं खो गए हैं, जिन्हें लगता है दुनिया बहुत बुरी है, जिन्हें लगता है वो तुच्छ है। समाज के सभी वर्गों को जिन्हें आपस में भेद भाव ने कहीं भटका दिया है। उन्हें, जिन्हें लगता है बहुत ज्यादा समय है और वो समय को ऐसे ही बर्बाद कर रहे हैं।  

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तो चलिए पढ़ते हैं

Table of Contents

‘kabir ke dohe kalyug ke liye’

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारेबैठ।

अर्थ: जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है।

लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते। तो चलिए उठते हैं ऑनलाइन बस कुछ देख लेने से कुछ नहीं होगा।

चलिए कुछ करते हैं। हाँ अगर मदद चाइये तो यकीन मानियेteam Svamee “आप के साथ है। बस आप हमें ईमेल तो कीजिए या कमेंट कीजिये ।


आछे / पाछे
दिन पाछे गए हरी से किया हेत,
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत।

अर्थ: देखते ही देखते सब अच्छे दिन, अच्छा समय बीतता चला गया तुमने प्रभु भक्ति में मन नहीं लगाया, प्यार नहीं किया समय बीत जाने पर पछताने से क्या मिलेगा ? पहले जागरूक थे – ठीक उसी तरह जैसे कोई किसान अपने खेत की रखवाली ही करे और देखते ही देखते पंछी उसकी फसल बर्बाद कर जाएं।

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा मिलिया कोय,

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा कोय।

अर्थ :- मैं दुनिया की बुराई ही बुराई देखने लगा पर जब मैंने अपने अंदर झाँका, जब मैंने अपनी अंतरात्मा में झांक के देखा तो मुझे खुद से बुरा कोई मिला ही नहीं।

कितने सहजता से अपनी बात कह गए की आप भला तो जग भला। अरे पहले आप तो अच्छे बनिये दुनिया तो वैसे ही अच्छी देखाई देगी। आप कोशिस तो कीजिए।

इस लिए ही हमने कहा था की ये kabir k dohe kalyug ke liye ही हैं। सोचिये हमें कितना मज़ा आता है, दूसरे के लिए बुरा बोलने में पर अगर हम दूसरों को सही करने की जगह खुद को सही करें तो हम कहां पहुंच जायेंगे। पर हमारे पास समय ही कहॉं है खुद के लिए। बस बाहरी आवरण नें हमें ऐसा जकड़ा है की हम बस चकाचौंद में ही खो गए हैं।

तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय,

कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय।

अर्थ: कभी भी किसी को तुच्छ या छोटा समझ के मजाक नई उड़ाना चाहिए अथवा हल्के में नहीं लेना चाहिए। एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है। हमेशा सब की इज्जत करो, आदर करो। हम सब एक समान हैं।

कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर,
ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर।

अर्थ: इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो। उल्ट हमें देखिये सब से ईर्ष्या , सब से द्वेष। किसी को खुश देख लें तो हमे अजीब सा दुःख होता है। अगर वो ये लाया तो मैं ये लाऊंगा अरे उसने ये किया मैं ये करूंगा।

एक ही जीवन है ईर्ष्या की तो कहाँ कुछ कर पाऊंगा

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,

सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

अर्थ: अब जब ये भी बताया ही है की पंडित कौन है, तो साधु के स्वभाव के बारे में भी कबीर जी कहते हैं साधु यानि सज्जन पुरूष का जीवन ऐसा होना चाहिये जो अच्छे को अपने अंदर रख ले तथा बुराई को बाहर कर दे जैसे सूप का स्वभाव होता है, सूप अपने पास अच्छे अनाज को रख कर उसकी गन्दगी साफ कर देता है। उसी प्रकार सज्जन लोगों को अपने अंदर अच्छाइयों को ग्रहण करके बुराइयों को दूर कर देना चाहिए।

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय,

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

अर्थ: ये आज कल के युवाओं के लिए बिल्कुल सही बैठता है जिन्हें कामयाबी शोहरत सब आसानी से चाहिए और जल्दी चाहिए। कबीर दास जी कहते हैं मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा।

ऐसा करने पर होता क्या है आप बहुत जोश से लग तो जाते हो पर दो दिन में जब कामयाबी नहीं मिलती तो दुखी हो कर छोड़ देते हो। अन्तः मेहन्त करें और लगे रहें जब तक रिजल्ट ना आये। अब तो आप भी समझ गए होंगे की क्यों इसका नाम “Kabir ke dohe kalyug ke liye” रखा है।

हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना,

आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम कोउ जाना।

 अर्थ: हिन्दू को राम प्यारा है और तुर्क (मुस्लिम) को रहमान प्यारा है। इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचते हैं , पर तब भी दोनों में से कोई सच को नहीं समझ पाता की राम भी वही है और रहमान भी वो ही है।

राम भी तू है रहमान भी तू है
इस अंधकार में ज्ञान भी तू है

जाति पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान


अर्थ: सज्जन
या साधु की जाति नहीं पूछनी चाहिए बस उनके ज्ञान को समझना चाहिए। तलवार का ही मूल्य होता है कि उसकी मयान या कवर का। देखिए कितनी बड़ी बात कह गए और हम जाती पाती में फंसे पड़े हैं। धर्म के नाम पे लड़ रहे हैं। जरा सोचिये परमेस्वर ने अगर हमें ऐसे बाँटना होता तो जरूर कुछ अलग कर के भेजता पर नहीं ये तो महज़ हमारे दिमाग की उपज है।

दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,

अपने याद आवई, जिनका आदि अंत।


अर्थ: यह मनुष्य का स्वभाव है कि वह
दूसरों के दोष देख कर हंसता है. मजाक उडाता है। पर तब उसे अपने दोष याद नहीं आते जिनका न आदि है और न अंत। हम सब में दोष हैं , परन्तु मनुष्य अपने दोष उजागर नहीं करता अपितु दूसरों के दोषों पे हँसता है।


बोली
एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,

हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।


अर्थ: हतियार से भी घातक है वाणी। वाणी व्यक्ति को तोड़ भी सकती है और जोड़ भी सकती है। प्रेम से बोलें तो आप की जय करा सकती है और आक्रोश में या बिना सोचे समझें बोले तो आप का विनाश । वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही मुंह से बाहर आने देनी चाहिए।

अति का भला बोलना, अति की भली चूप,

अति का भला बरसना, अति की भली धूप।

अर्थ: न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही ज्यादा चुप रहना ही ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है। व्यक्ति को हमेशा ही अति नहीं करनी चाहिए अपने कर्म सोच विचार कर के ही करने चाहिए। यदि व्यक्ति अत्याधिक भोला है तो लोग उसका फायदा उठा लेते हैं यदि व्यक्ति बहुत तेज़ है तो लोग उस से दुरी बना लेते हैं। तो हमेशा अच्छे रहें जरूरत से ज्यादा भी नहीं और कम भी नहीं।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया कोय,

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।


अर्थ: पुस्तकें
पढ़ कर संसार में कितने ही लोग चले गए ,पर सभी विद्वान बन सके। पर जिन्होंने प्रेम के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ लिए वो महाज्ञानी हो गए।

जो प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले वही सच्चा ज्ञानी है, वो ही पंडित है यहां कौन सदा के लिए है सब ने आना है और जाना है, बस रह जाएगी तो प्रेम भावना और यादें। अच्छी बुरी सब आप के ऊपर।
 

दुर्लभ मानुष जन्म है, देह बारम्बार,

तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि लागे डार।


अर्थ: इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है। यह मानव शरीर वृक्ष से गिरे उन पतों की तरह है जो एक बार पेड़ से गिर गए तो दोबारा डाल पर नहीं लग सकते। एक ही जन्म है तो उसे बर्बाद ना करें। ऐसा कुछ करें की आप के जाने के बाद भी लोग आप को याद रखें।
 

जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं,

जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं।
 

अर्थ: इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुर्झायेगा। जो चिना गया है वह गिर जायेगा और जो आया है वह जाएगा। सब ने जाना है। हम क्या करते हैं ऐसा सोचते हैं जैसा सब हमने ही किया हो। और कभी कभी तो लगता है की अपुन हीच भगवान है। अन्तः अच्छे कर्म कीजिए लोगों की मदद कीजिये सब के मंगल की कामना कीजिए। Svamee सब का भला करेंगे।
 

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ,

जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।

अर्थ: कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है। तो हमेशा अच्छी संगति में रहो सज्जनो से मित्ररता रखो और दुर्जनो से दूरी।

 

तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई,

सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।
 

अर्थ: शरीर में भगवे वस्त्र धारण करना सरल है, पर मन को योगी बनाना सरल नहीं है। मन बहुत चंचल है कम ही व्यक्ति मन को काबू में कर के योगी होते हैं। य़दि मन योगी हो जाए तो सारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। आज कल तो कोई भी भगवा पहन के साधु बनने का दिखावा कर रहे हैं पर साधु तो वो ही है जिसकी इन्द्रियां काबू में हैं।

बाकी आप भी बताएं की आप को कौन से kabir ke dohe kalyug ke liye बिल्कुल ठीक लगे।